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Why Sawamani Prasad?

भक्तभगवत्सेवामेंअपनीमनोकामनापूर्णहोनेपरअपनेसंकल्पकेअनुसारसवामनीकाभोगप्रभुकोलगातेहैं, जिसकोतत्पश्चात्श्रीप्रभुकेभक्तोंएवंसमाजकेकमजोरवर्गकेव्यक्तिगणमंदिरपरिसरमेंग्रहणकरतेहैं।यहसम्पूर्णव्यवस्थाहमारीओरसेकीजातीहै।

भक्तोंकेसहयोगसेसमाजकेकमजोरवर्गसमूहमेंसवामनीप्रसादवितरणकाशुभारंभकियाहै।इससंकल्पमेंशैक्षिणिकसंस्थाओं, कुष्ठ, नेत्रहीन, अपंग, आश्रमतथाआर्थिकरूपसेकमजोरसमाजकल्याणकेन्द्रोंकोप्रतिदिनएकसमयकाप्रसादनियमितरूपसेभेजाजारहाहै

*सवामणीभोगकामहत्व*

'पत्रं, पुष्पं, फलं, तोयंयोमेभक्त्याप्रयच्छति

तदहभक्त्युपहृतमश्नामिप्रयतात्मन:'

अर्थ :जोकोईभक्तमेरेलिएप्रेमसेपत्र, पुष्प, फल, जलआदिअर्पणकरताहै, उसशुद्धबुद्धिनिष्कामप्रेमीकाप्रेमपूर्वकअर्पणकियाहुआवहपत्र-पुष्पादिमैंसगुणरूपमेंप्रकटहोकरप्रीतिसहितखाताहूं। -श्रीकृष्ण

सवामणप्रसादचढ़ावेंकोनैवेद्य, आहुतिऔरहव्यसेजोड़करदेखाजातारहाहै, लेकिनप्रसादकोप्राचीनकालसेहीनैवेद्यकहतेहैंजोकिशुद्धऔरसात्विकअर्पणहोताहै।इसकेसंबंधकिसीबलिआदिसेनहींहोता।हवनकीअग्निकोअर्पितकिएगएभोजनकोहव्यकहतेहैं।यज्ञकोअर्पितकिएगएभोजनकोआहुतिकहाजाताहै।दोनोंकाअर्थएकहीहोताहै।हवनकिसीदेवी-देवतकेलिएऔरयज्ञकिसीखासमकसदकेलिए।

प्राचीनकालसेहीप्रत्येकहिन्दूभोजनकरतेवक्तउसकाकुछहिस्सादेवी-देवताओकोसमर्पितकरतेआयाहै।यज्ञकेअलावावहघर-परिवारमेंभोजनकाएकहिस्साअग्निकोसपर्पितकरताथा।अग्निउसहिस्सेकोदेवताओंतकपहुंचादेताथा।चढा़एजानेकेउपरांतनैवेद्यद्रव्यनिर्माल्यकहलाताहै।

यज्ञ, हवन, पूजाऔरअन्नग्रहणकरनेसेपहलेभगवानकोनैवेद्यएवंभोगअर्पणकीशुरुआतवैदिककालसेहीरहीहै।शतपतब्राह्मणग्रंथमेंयज्ञकोसाक्षातभगवानकास्वरूपकहागयाहै।यज्ञमेंयजमानसर्वश्रेष्ठवस्तुएंहविरूपसेअर्पणकरदेवताओंकाआशीर्वादप्राप्तकरनाचाहताहै।

शास्त्रोंमेंविधानहैकियज्ञमेंभोजनपहलेदूसरोंकोखिलाकरयजमानकरेंगे।वेदोंकेअनुसारयज्ञमेंहृविष्यान्नऔरनैवेद्यसमर्पितकरनेसेव्यक्तिदेवऋणसेमुक्तहोताहै।प्राचीनसमयमेंयहनैवेद्य (भोग) अग्निमेंआहुतिरूपमेंहीदियाजाताथा, लेकिनअबइसकास्वरूपथोड़ा-साबदलगयाहै।

पूजा-पाठयाआरतीकेबादतुलसीकृतजलामृतवपंचामृतकेबादबांटेजानेवालेपदार्थकोप्रसादकहतेहैं।पूजाकेसमयजबकोईखाद्यसामग्रीदेवी-देवताओकेसमक्षप्रस्तुतकीजातीहैतोवहसामग्रीप्रसादकेरूपमेंवितरणहोतीहै।इसेनैवेद्यभीकहतेहैं।

कौनसेदेवताकोकौनसाचढ़तानैवेद्य...

प्रत्येकदेवीयादेवताकानैवेद्यअलग-अलगहोताहै।यहनैवेद्ययाप्रसादजबव्यक्तिभक्ति-भावनसेग्रहणकरताहैतोउसमेंविद्यमानशक्तिसेउसेलाभमिलताहै।

कौनसेदेवताकोकौनसानैवेद्य :

1.ब्रह्माजीको...

2.विष्णुजीकोखीरयासूजीकाहलवेकानैवेद्यबहुतपसंदहै।

3.शिवकोभांगऔरपंचामृतकानैवेद्यपसंदहै।

4.सरस्वतीकोदूध, पंचामृत, दही, मक्खन, सफेदतिलकेलड्डूतथाधानकालावापसंदहै।

5.लक्ष्मीजीकोसफेदरंगकेमिष्ठान्न, केसरभातबहुतपसंदहोतेहैं।

6.दुर्गाजीकोखीर, मालपुए, पूरणपोली, केले, नारियलऔरमिष्ठान्नबहुतपसंदहैं।

7.गणेशजीकोमोदकयालड्डूकानैवेद्यअच्छालगताहै।

8.श्रीरामजीकोकेसरभात, खीर, धनिएकाप्रसादआदिपसंदहैं।

9.हनुमानजीकोहलुआ, पंचमेवा, गुड़सेबनेलड्डूयारोठ, डंठलवालापानऔरकेसरभातबहुतपसंदहै।

9.श्रीकृष्णकोमाखनऔरमिश्रीकानैवेद्यबहुतपसंदहै।

अगलपन्नेपरकैसेचढ़ाएंनैवेद्य...

नैवेद्यचढ़ाएजानेकेनियम :

* नमक, मिर्चऔरतेलकाप्रयोगनैवेद्यमेंनहींकियाजाताहै।

* नैवेद्यमेंनमककीजगहमिष्ठान्नरखेजातेहैं।

* प्रत्येकपकवानपरतुलसीकाएकपत्तारखाजाताहै।

* नैवेद्यकीथालीतुरंतभगवानकेआगेसेहटानानहींचाहिए।

* शिवजीकेनैवेद्यमेंतुलसीकीजगहबेलऔरगणेशजीकेनैवेद्यमेंदूर्वारखतेहैं।

* नैवेद्यदेवताकेदक्षिणभागमेंरखनाचाहिए।

* कुछग्रंथोंकामतहैकिपक्वनैवेद्यदेवताकेबाईंतरफतथाकच्चादाहिनीतरफरखनाचाहिए।

* भोगलगानेकेलिएभोजनएवंजलपहलेअग्निकेसमक्षरखें।फिरदेवोंकाआह्वानकरनेकेलिएजलछिड़कें।

* तैयारसभीव्यंजनोंसेथोड़ा-थोड़हिस्साअग्निदेवकोमंत्रोच्चारकेसाथस्मरणकरसमर्पितकरें।अंतमेंदेवआचमनकेलिएमंत्रोच्चारसेपुन: जलछिड़केंऔरहाथजोड़करनमनकरें।

* भोजनकेअंतमेंभोगकायहअंशगाय, कुत्तेऔरकौएकोदियाजानाचाहिए।

* पीतलकीथालीयाकेलेकेपत्तेपरहीनैवेद्यपरोसाजाए।

* देवताकोनिवेदितकरनाहीनैवेद्यहै।सभीप्रकारकेप्रसादमेंनिम्नप्रदार्थप्रमुखरूपसेरखेजातेहैं- दूध-शकर, मिश्री, शकर-नारियल, गुड़-नारियल, फल, खीर, भोजनइत्यादिपदार्थ।

आखिरक्याफायदाहोगानैवेद्यअर्पितकरउसेखानेसे...

* मनऔरमस्तिष्ककोस्वच्छ, निर्मलऔरसकारात्मकबनानेकेलिएहिन्दूधर्ममेंकईरीति-रिवाज, परंपराऔरउपायनिर्मितकिएगएहैं।सकारात्मकभावसेमनशांतचित्तरहताहै।शांतचित्तमनसेहीव्यक्तिकेजीवनकेसंतापऔरदुखमिटतेहैं।

* लगातारप्रसादवितरणकरतेरहनेकेकारणलोगोंकेमनमेंभीआपकेप्रतिअच्छेभावोंकाविकासहोताहै।इससेकिसीकेभीमनमेंआपकेप्रतिराग-द्वेषनहींपनपताऔरआपकेमनमेंभीउसकेप्रतिप्रेमरहताहै।

* लगातारभगवानसेजुड़ेरहनेसेचित्तकीदशाऔरदिशाबदलजातीहै।इससेदिव्यताकाअनुभवहोताहैऔरजीवनकेसंकटोंमेंआत्मबलप्राप्तहोताहै।देवीऔरदेवताभीसंकटोंकेसमयसाथखड़ेरहतेहैं।

* भजन, कीर्तन, नैवेद्यआदिधार्मिककर्मकरनेसेजहांभगवानकेप्रतिआस्थाबढ़तीहैवहींशांतिऔरसकारात्मकभावकाअनुभवहोतारहताहै।इससेइसजीवनकेबादभगवानकेउसधाममेंभगवानकीसेवाकीप्राप्तिहोतीहैऔरअगलाजीवनऔरभीअच्छेसेशांतिवसमृद्धिपूर्वकव्यतीतहोताहै।

* श्रीमद्भगवद्गीता (7/23) केअनुसारअंतमेंहमेंउन्हींदेवी-देवताओकेस्वर्ग, इत्यादिधामोंमेंवासमिलताहैजिसकीहमआराधनाकरतेरहतेहैं।

* श्रीमद्भगवद्गीतामेंभगवानश्रीकृष्ण, अर्जुनकेमाध्यमसेहमेंयहभीबतातेहैंकिदेवी-देवताओकेधामजानेकेबादफिरपुनर्जन्महोताहैअर्थातदेवी-देवताओकाभजनकरनेसे, उनकाप्रसादखानेसेवउनकेधामतकपहुंचनेपरभीजन्म-मृत्यकाचक्रखत्मनहींहोताहै। (श्रीगीता 8/16)